अपस्मार | मिर्गी | Epilepsy

अपस्मार या मिर्गी (वैकल्पिक वर्तनी: मिरगी, अंग्रेजी: Epilepsy) एक तंत्रिकातंत्रीय विकार (न्यूरोलॉजिकल डिसॉर्डर) है जिसमें रोगी को बार-बार दौरे पड़ते है। मस्तिष्क में किसी गड़बड़ी के कारण बार-बार दौरे पड़ने की समस्या हो जाती है। दौरे के समय व्यक्ति का दिमागी संतुलन पूरी तरह से गड़बड़ा जाता है और उसका शरीर लड़खड़ाने लगता है। इसका प्रभाव शरीर के किसी एक हिस्से पर देखने को मिल सकता है, जैसे चेहरे, हाथ या पैर पर। इन दौरों में तरह-तरह के लक्षण होते हैं, जैसे कि बेहोशी आना, गिर पड़ना, हाथ-पांव में झटके आना। मिर्गी किसी एक बीमारी का नाम नहीं है। अनेक बीमारियों में मिर्गी जैसे दौरे आ सकते हैं। मिर्गी के सभी मरीज एक जैसे भी नहीं होते। किसी की बीमारी मध्यम होती है, किसी की तेज। यह एक आम बीमारी है जो लगभग सौ लोगों में से एक को होती है। इनमें से आधों के दौरे रूके होते हैं और शेष आधों में दौरे आते हैं, उपचार जारी रहता है। अधिकतर लोगों में भ्रम होता है कि ये रोग आनुवांशिक होता है पर सिर्फ एक प्रतिशत लोगों में ही ये रोग आनुवांशिक होता है। विश्व में पाँच करोड़ लोग और भारत में लगभग एक करोड़ लोग मिर्गी के रोगी हैं। विश्व की कुल जनसँख्या के ८-१० प्रतिशत लोगों को अपने जीवनकाल में एक बार इसका दौरा पड़ने की संभावना रहती है। १७ नवम्बर को विश्व भर में विश्व मिरगी दिवस का आयोजन होता है। इस दिन तरह-तरह के जागरुकता अभियान और उपचार कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है।

कारण

रोग था उसके बावजूद वे श्रेष्ठ कोटि के कलाकार थे। कारण मानव मस्तिष्क कई खरब तंत्रिका कोशिकाओं से निर्मित होता है। इन कोशिकाओं की क्रियाशीलता कार्य-कलापों को नियंत्रित करती है। मस्तिष्क के समस्त कोषों में एक विद्युतीय प्रवाह होता है जो नाड़ियों द्वारा प्रवाहित होता है। ये सारे कोष विद्युतीय नाड़ियों के माध्यम से आपस में संपर्क बनाये रखते हैं, लेकिन कभी मस्तिष्क में असामान्य रूप से विद्युत का संचार होने से व्यक्ति को एक विशेष प्रकार के झटके लगते हैं और वह मूर्छित हो जाता है। ये मूर्छा कुछ सेकिंड से लेकर ४-५ मिनट तक चल सकती है।[3] मिर्गी रोग दो प्रकार का हो सकता है आंशिक तथा पूर्ण। आंशिक मिर्गी में मस्तिष्क का एक भाग अधिक प्रभावित होता है। पूर्ण मिर्गी में मस्तिष्क के दोनों भाग प्रभावित होते हैं। इसी प्रकार अनेक रोगियों में इसके लक्षण भी भिन्न-भिन्न होते हैं। प्रायः रोगी व्यक्ति कुछ समय के लिए चेतना खो देता है। कुछ विशेषज्ञों के अनुसार सूअर की आंतों में मिलने वाले फीताकृमि के संक्रमण से भी मिर्गी की संभावना रहती है। इस कृमि का सिस्ट यदि किसी प्रकार मस्तिष्क में पहुँच जाए तो उसके क्रियाकलापों को प्रभावित कर सकता है, जिससे मिर्गी की आशंका बढ़ जाती है। कैंब्रिज विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं की एक टीम के नायक माईक एडवर्डसन के अनुसार ग्राही तंत्रों से मिलने वाले संकेतों में गड़बड़ी के कारण ही मिर्गी और पी.एम.टी.की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। नए अध्ययन में यह भी पाया कि मस्तिष्क में ग्राही तंत्रों की संख्या बहुत कम होती है लेकिन ये मानवीय चेतना के नियंत्रण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इनके अनुसार ग्राही तंत्रों की रचना के बारे में विस्तार से जानकारी प्राप्त कर ली गई है, अतः इसमें गड़बड़ी के कारण होने वाली बीमारियों के इलाज के लिए दवाएं तैयार करना अब आसान हो गया है।

दौरे के समय

दौरों की अवधि कुछ सेकेंड से लेकर दो-तीन मिनट तक होती है। और यदि यह दौरे लंबी अवधि तक के हों तो चिकित्सक से तत्काल परामर्श लेना चाहिये। कई मामलों में मिरगी की स्थिति पुरुषों की तुलना में महिलाओं में अलग होती है। दोनों की स्थिति में अंतर का प्रमुख कारण महिलाओं और पुरुषों में शारीरिक और सामाजिक अंतर का होना होता है। जब रोगी को दौरे आ रहे हों, या बेहोश पडा हो, झटके आ रहे हों तो उसे साफ, नरम जगह पर करवट से लिटाकर सिर के नीचे तकिया लगाकर कपडे ढीले करके उसके मुंह में जमा लार या थूक को साफ रुमाल से पोंछ देना चाहिये। दौरे का काल और अंतराल समय ध्यान रखना चाहिये। ये दौरे दिखने में भले ही भयानक होते हों, पर असल में खतरनाक नहीं होते। दौरे के समय इसके अलावा कुछ और नहीं करना होता है, व दौरा अपने आप कुछ मिनटों में समाप्त हो जाता है। उसमें जितना समय लगना है, वह लगेगा ही। ये ध्यान-योग्य है कि रोगी को जूते या प्याज नहीं सुंघाना चाहिये। ये गन्दे अंधविश्वास हैं व बदबू व कीटाणु फैलाते हैं। इस समय हाथ पांव नहीं दबाने चाहिये न ही हथेली व पंजे की मालिश करें क्योंकि दबाने से दौरा नहीं रुकता बल्कि चोट व रगड़ लगने का डर रहता है। रोगी के मुंह में कुछ नहीं फंसाना चाहिये। यदि दांतों के बीच जीभ फंसी हो तो उसे अंगुली से अंदर कर दें अन्यथा दांतों के बीच कटने का डर रहता है। मिरगी के रोगी सामान्य खाना खा सकते हैं अतएव उन्हें भोजन का परहेज नहीं रखना चाहिये। इस अवस्था में व्रत, उपवास, रोजे आदि रखने से कुछ रोगियों में दौरे बड़ सकते हैं अतः इनसे बचना चाहिये। यदि अन्न न लेना हो तो दूध या फलाहार द्वारा पेट आवश्यक रूप से भरा रखना चाहिये। मिर्गी रोगी का विवाह हो सकता है एवं वे प्रजनन भी कर सकते हैं। उनके बच्चे स्वस्थ होंगे या उन्हें मिर्गी होने की अधिक संभावना नहीं होती। गर्भवती होने पर महिला को दौरे रोकने की गोलियाँ नियमित लेते रहना चाहिये क्योंकि इन गोलियों से अधिकतर मामलों में बुरा असर नहीं पडता। गोलियाँ खाने वाली महिला स्तनपान भी करा सकती है।

रोग की संभावना

मिर्गी किसी को भी हो सकती है, बालक, वयस्क, वृद्ध, पुरुष, स्त्री, सब को। दिमाग पर जोर पडने से मिर्गी नहीं होती। कई लोग खूब दिमागी काम करते हैं परन्तु स्वस्थ रहते हैं। मानसिक तनाव या अवसाद से मिर्गी नहीं होती है। अच्छे भले, हंसते-गाते इंसान को भी मिर्गी हो सकती है। मेहनत करने और थकने से भी मिर्गी नहीं होती, वरन ये आराम करने वाले को भी हो सकती है। कमजोरी या दुबलेपन से मिर्गी नहीं होती बल्कि खाते पीते पहलवान को भी हो सकती है, न ही मांसाहार करने से मिर्गी होती है, बल्कि शाकाहारी लोगों को भी उतनी ही संभावना से मिर्गी हो सकती है। मिर्गी का एक कारण सिर की चोट भी है। सामान्यत: महिलाओं में इसका प्रभाव प्रजनन शक्ति में देखने में आता है। हालांकि, इसका ये अर्थ नहीं होता है कि मिरगी से पीड़ित महिला रोगियों को बच्चा नहीं होता, ऐसा बिल्कुल नहीं है। मिरगी से पीड़ित महिला रोगियों के बच्चे सामान्य होते हैं। चिकित्सकों के अनुसार जन्म के दौरान चोट लगना भी मिरगी रोग का एक कारण होता है। मिर्गी खानदानी रोग नहीं है और बहुत कम मामलों में इसका खानदानी प्रभाव देखा जाता है जो कि एक संयोग हो सकता है। ९० प्रतिशत मामलों में खानदानी असर नहीं होता। मिर्गी के अधिकांश रोगियों का दिमाग अच्छा होता है व अनेक रोगी बुद्धिमान व चतुर होते हैं। लगभग सभी रोगी समझदार होते हैं। पागलपन व दिमागी गड़बड़ियां बहुत कम मामलों में देखी जाती हैं।मनोचिकित्सकों के अनुसार इस रोग से ग्रसित व्यक्ति आम लोगों की तरह अपना जीवन व्यतीत कर सकते हैं।